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Mehfil101

Muskurane Ke Liye Ek Lavz Hi Kaafi Hai...

हालत.!!

अपने दिल की हालत को,
मेरे दिल की हालत से ना जोड़.!

इस दिल में तेरा नाम लिखा,
क्या तेरे पास इसका कोई तोड़.!!

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बड़ी कमब्खत है.!!

बड़ी कमब्खत जान है,
छिप छिप हाल-ए-दिल हमारा सुनती.!
लोगों को ना ना कहती,
तन्हा सपनों में ताने-बाने हमारे बुनती.!!

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वो क्या करेंगे इश्क़.!!

वो क्या करेंगे इश्क़”सागर“,
जो खुद में ही जीते हैं.!

तन्हा तड़पने को छोड़ देते,
अपनों को भुला देते हैं.!!

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Good Bye Ss…!!

ज़िन्दगी के सफर में कई मिलते और बिछड़ते “सागर”.!

जीते वही चैन जो बिछड़ने की आदत डाल लेते “सागर”.!!

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खुदा से”सागर”कैसी फरमाइश है.!!

उनका तस्सवुर उनकी आरज़ू,
ज़िन्दगी की ये कैसी ख्वाहिश है.!

जो कभी अपनी हो नहीं सकती,
खुदा से”सागर“कैसी फरमाइश है.!!

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Why…

आग लगा तन-मन में कहाँ खो जाते हो,
वैसे भी सरकार बहुत कम नज़र आते हो.!
दीद को तरसें सारा-सारा दिन और रात,
क्यों “सागर” की जान पर बन आते हो.!!

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मुंह ना फेरो.!!

यूँ शर्मा के मुंह ना फेरो,
हया में हुस्न और भी निखर जाता.!

दीवाने राह चलना भूलते,
उन का दिल मतवाला हो जाता.!!

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हक़ .!!

मान-सम्मान पाने का सबको बराबर का हक़ है”सागर“.!
यहाँ कोई बड़ा नहीं कोई छोटा नहीं सब बराबर”सागर“.!!

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काश.!!

काश किसी हसीना को इम्प्रेस्सेड कर पाते”सागर”.!
इतने क़ाबिल होते तो क्या अब घुमते आवारा बदल.!!

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क़ातिल अदा.!.!!

आये-हाय कहना है हसीनों की क़ातिल अदा.!
क़त्ल करवा ढूंढें आशिक़ फिरभी उनमें वफ़ा.!!

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“सागर”आवारा बादल नहीं.!!

न ख्वाहिश न कोई अरमान इस दिल में ,
जानता हूँ गैर है.!
यूँ भी हद में रहने की आदत “सागर” को,
आवारा बादल नहीं.!!

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इंतज़ार.!!

बेसब्री से इंतज़ार था आपकी वाह-वाही का,
कलाम-ए-शायरी पर पीठ थप-थपाई का.!

वैसे ज़माने में मौका नहीं छोड़ते हैं”सागर”,
लोग अपनों की खींच और जग-हसाई का.!!

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सिन्टैम्स हैं इश्क़ के.!!

सिन्टैम्स सारे हैं इश्क़ के,
जाकर हक़ीन साहेब के पास इलाज़ कराओ.!
इससे पहले रोग बड़ जाए,
दवाखाने जा कर दर्द-ए-रोग की दवा ले आओ.!!

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हाल-ए-दिल.!!

आज कल आप कहाँ और आप के वो अरमान कहाँ.!
जो कभी लफ़्ज़ों में पिरो हाल-ए-दिल बयान करते थे.!!

Aaj kal Aap kahan aur aap ke wo armaan kahan.!
Jo kabhi lafzon mein piro haal-e-dil byan karte the.!!

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बमुश्किल मिलते चाहने वाले…

दूर से तीर चलाना आसान है,
करीब आ दिखाओ तो जाने.!
महकती सांसों की खुश्बू से,
रूबरू करा जाओ तो जाने.!!

गर क़बूल निकले तेरे दिल से,
हर सजा क़बूल “सागर “को.!
क़तल फिर चाहे कर कितने,
तैयार हैं हर अदाको अपनाने.!!

दिल लेना-देना नहीं बता दो,
इस दिल के और कई दीवाने.!
बमुश्किल मिलते चाहने वाले,
ना कर”सागर“से इतने बहाने.!!

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कैसी रीत”सागर”बनाने वाले की.!!

हुस्न इतना बेपर्दा क्यों है,
क्यों देता फिर इश्क़ को इलज़ाम.!
गर आँख बंद चलोगे तो,
भुगतना पड़ सकता कोई अंजाम.!!

हमीं पे जुल्म हमीं पे इलज़ाम,
ये कैसी अदा इन हुस्न वालों की.!
रिझाते भी हैं और तड़पाते भी,
कैसी रीत”सागर“बनाने वाले की.!!

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